Wednesday, May 23, 2012

भाजपा की हार पर बची सरकार

झारखंड में भाजपानीत गठबंधन सरकार चल रही है लेकिन राज्यसभा चुनाव में भाजपा के प्रत्याशी एसएस अहलूवालिया ही चुनाव हार गए। इससे अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि सत्ताधारी गठबंधन दल सरकार तो चला रहे हैं पर वे साथ नहीं हैं। जाहिर है गठबंधन मजबूरी का है और उसकी गांठें इतनी कमजोर हैं कि जैसे ही कोई दलीय हित सामने आता है एक-एक कर खुलने लगती हैं। वैसे भाजपा आलाकमान के लिए भले ही अहलूवालिया की हार बड़ा झटका हो लेकिन इस महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम से राज्य की सत्ता पर काबिज भाजपा नेता राहत की सांस ले सकते हैं कि मुश्किल में फंसी सरकार बच गई। हालांकि यह संकट सिर्फ फौरी तौर पर ही टला है लिहाजा भाजपा को भी यह सोचना होगा कि आखिरकार ऐसी स्थिति आई कैसे? शुरू से ही भाजपा के साथ कदमताल कर रही आजसू के विधायक झामुमो के साथ मजबूती से खड़े हो गए। आजसू के समर्थन से गदगद झामुमो ने एक कदम आगे बढ़कर यहां तक कह दिया कि आने वाले दिनों में हटिया विधानसभा चुनाव तो क्या, अब दोनों दल मिलकर अपने गठबंधन का पूरे राज्य में विस्तार करेंगे। तस्वीर साफ है, यानी दोनों दल एक साथ मिलकर चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। यह राजनीतिक साझेदारी कही न कही भाजपा को ही देरसवेर नुकसान पहुंचाएगी। भाजपा के पास जीत के पर्याप्त आंकड़े नहीं थे। हाईकमान को इस बात की आशा थी कि पार्टी के प्रबंधक जीत के लिए आवश्यक वोट जुटा लेंगे लेकिन दल के रणनीतिकार इसमें असफल रहे। वैसे देख जाए तो अगर परिणाम उल्टा होता यानी भाजपा जीत जाती और झामुमो को हार का सामना करना पड़ता तो झारखंड की भाजपा सरकार पर संकट तय था। वैसे भी राजनीतिक अस्थिरता झारखंड की नियति रही है। शासन तंत्र का ज्यादा वक्त सत्ता को बरकरार रखने में जाया होता है।


वैसे राज्यसभा चुनाव के कारण झामुमो व भाजपा में खटास पैदा हुई है। लेकिन भाजपा के लिए यह आत्मचिंतन का विषय होगा कि आजसू ने किन वजहों से झामुमो को समर्थन किया, भाजपा के चुनाव प्रबंधक क्यों तीन-चार अतिरिक्त मतों का जुगाड़ नहीं कर पाए? सरकार को समर्थन दे रहे दो निर्दलीय विधायकों ने किस स्थिति में कांग्र्रेस के प्रत्याशी को समर्थन दिया। राज्यसभा चुनाव झारखंड की मुंडा सरकार का लिटमस टेस्ट था। आगे हटिया में भी विधानसभा उपचुनाव होना है। हटिया की पृष्ठभूमि भी कुछ ऐसी ही है। अगर भाजपानीत गठबंधन सरकार के घटक दल संभलकर नहीं चले तो सरकार मुश्किल में पड़ेगी। राज्यसभा चुनाव में हार से भाजपा को सबक लेने की जरूरत है। सबक यह है कि संभलकर और तालमेल बनाकर नहीं चले तो विपक्ष भविष्य में और हावी होगा, जिसका असर आखिरकार सरकार पर ही पडऩे वाला है।

बहरहाल कांग्रेस ने झाविमो विधायकों के मतदान न करने के बावजूद जिस तरह से निर्दलीय विधायकों को अपने पाले में साधा कर राज्य सभा की यह सीट जीती हैै उससे साबित हो जाता है कि मौका आने पर वह सत्ता के लिए भी जोड़तोड़ में पीछे नहीं रहेगी।

Tuesday, May 8, 2012

जहां हिन्दू अल्पसंख्यक, वहां अत्याचार

सर्वधर्म समभाव और वसुधैव कुटुंबकम् को जीवन का आधार मानने वाले हिन्दुओं की स्थिति उन देशों में काफी बदतर है जहां वे अल्पसंख्यक हैं। भारत से बाहर रह रहे हिन्दुओं की आबादी लगभग 20 करोड़ है जिसमें सबसे ज्यादा खराब स्थिति दक्षिण एशिया के देशों में रह रहे हिन्दुओं की है।  बांग्लादेश, भूटान, फिजी, मलेशिया, पाकिस्तान, श्रीलंका और त्रिनिदाद-टौबेगो में हाल के वर्षों में हिन्दू अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार के मामले बढ़े हैं। इसमें जबरन धर्मान्तरण, यौन उत्पीडऩ, धार्मिक स्थलों पर आक्रमण, सामाजिक भेदभाव, संपत्ति हड़पना आदि शामिल है। इसमें कुछ देशों में राजनीतिक स्तर पर भी हिन्दुओं के साथ भेदभाव की शिकायतें सामने आई है। हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन की आठवीं वार्षिक मानवाधिकार रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। यह रिपोर्ट 2011 की है जिसे हाल ही में जारी किया गया है।

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में 1947 में कुल आबादी का 25 प्रतिशत हिन्दू थे। अभी इनकी जनसंख्या कुल आबादी का मात्र 1.6 प्रतिशत रह गई है। गैर-मुस्लिमों के साथ यहां दोयम दर्जे का व्यवहार हो रहा है। 24 मार्च 2005 को पाकिस्तान में नए पासपोर्ट में धर्म की पहचान को अनिवार्य कर दिया गया। स्कूलों में इस्लाम की शिक्षा दी जाती है। गैर-मुस्लिम खासकर हिन्दुओं के साथ असहिष्णु व्यवहार किया जाता है। जनजातीय बहुल इलाकों में अत्याचार ज्यादा है। यहां पाकिस्तान पर इस्लामिक कानून लागू करने का भारी दबाव है। हिन्दू युवतियों और महिलाओं के साथ बलात्कार, अपहरण की घटनाएं आम है। उन्हें इस्लामिक मदरसों में रखकर जबरन धर्मान्तरण का दबाव दिया जाता है। गरीब हिन्दू तबका बंधुआ मजदूर की तरह जीने को मजबूर है। इसी तरह भारत के हस्तक्षेप से अस्तित्व में आए बांग्लादेश में भी हिन्दुओं पर अत्याचार के मामले में तेजी से बढ़े हैं। बांग्लादेश ने वेस्टेड प्रापर्टीज रिटर्न (एमेंडमेंट) बिल 2011 को लागू किया है जिसमें जब्त की गई या मुसलमानों द्वारा कब्जा की गई हिन्दुओं की जमीन को वापस लेने के लिए क्लेम करने का अधिकार नहीं है। इस बिल के पारित होने के बाद हिन्दुओं की जमीन कब्जा करने की प्रवृति बढ़ी है और इसे सरकारी संरक्षण भी मिल रहा है। इसका विरोध करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर भी जुल्म ढाए जाते हैं। इसके अलावा इस्लामी कïट्टरपंथियों के निशाने पर हिन्दुओं की आबादी है। इनके साथ मारपीट, बलात्कार, अपहरण, जबरन धर्मान्तरण, मंदिरों में तोडफ़ोड़ और शारीरिक उत्पीडऩ आम बात है। अगर यह जारी रहा तो अगले 25 वर्षों में बांग्लादेश में हिन्दुओं की आबादी ही समाप्त हो जाएगी।

बहु-धार्मिक, बहु-सांस्कृतिक और बहुभाषी देश कहे जाने वाले भूटान में भी हिन्दुओं के खिलाफ अत्याचार हो रहा है। 1990 के दशक में दक्षिण और पूर्वी इलाके से एक लाख हिन्दू अल्पसंख्यकों और नियंगमापा बौद्धों को बेदखल कर दिया गया। ईसाई बहुल देश फिजी में हिन्दुओं की आबादी 34 प्रतिशत है। यहां रहने वाले हिन्दुओं को हमेशा घृणास्पद भाषणों का सामना करना पड़ता है। 2008 में यहां कई हिन्दू मंदिरों को निशाना बनाया गया। 2009 में ये हमले बंद हुए। फिजी के मेथोडिस्ट चर्च ने लगातार इसे इसाई देश घोषित करने की मांग की लेकिन बैमानिरामा के प्रधानमंत्रित्व में गठित अंतरिम सरकार ने इसे खारिज कर दिया और अल्पसंख्यकों खासकर हिन्दुओं के संरक्षण की बात कही। मलेशिया घोषित इस्लामी देश है इस लिए यहां की हिन्दू आबादी को अक्सर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थानों को यहां अक्सर निशाना बनाया जाता है। सरकार मस्जिदों को सरकारी जमीन और मदद मुहैया कराती है लेकिन हिन्दू धार्मिक स्थानों के साथ इस नीति को अमल में नहीं लाती। हिन्दू कार्यकर्ताओं पर तरह-तरह के जुल्म ढाए जाते हैं और उन्हें कानूनी मामलों में जबरन फंसाया जाता है। उन्हें शरिया अदालतों में पेश किया जाता है जहां अदालतों के आदेश को मानने के लिए दबाव बनाया जाता है।

सिंहली बहुल आबादी वाले श्रीलंका में हिन्दुओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता है। पिछले कई दशक से हिन्दू और तमिल आबादी खतरे का शिकार है। हिंसा के कारण उन्हें लगातार पलायन का दंश झेलना पड़ रहा है। हिन्दू संस्थानों को सरकारी संरक्षण नहीं मिलता है। त्रिनिदाद-टोबैगो में भारतीय मूल की कमला परसाद बिसेसर के सत्ता संभालने के बाद आशा बंधी है कि हिन्दुओं के साथ साठ दशकों से होता आ रहा अत्याचार समाप्त होगा। यहां की अधिकांश आबादी हिन्दू इंडो -त्रिनिदादियंस और एफ्रो-त्रिनिदादियंस की है। रोमन कैथालिक और हिन्दू बड़े समूह में हैं। हिन्दुओं को लगातार आक्रमण झेलना पड़ता है। इसके अलावा घृणास्पद भाषण और हिंसा का शिकार होना पड़ता है। इंडो -त्रिनिदादियंस समूह सरकारी नौकरियों और अन्य सरकारी सहायता से वंचित है। हिन्दू संस्थाओं के साथ और हिन्दू त्योहारों के दौरान हिंसा होती है।

हिन्दू अमेरिकन फाउंडेशन की आठवीं वार्षिक मानवाधिकार रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर में हिन्दुओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार का भी जिक्र है। पाकिस्तान ने कश्मीर के 35 फीसदी भू-भाग पर अवैध तरीके से कब्जा कर रखा है। कुछ भाग चीन के हिस्से में तो अन्य हिस्सा भारत के पास है। 1980 के दशक से यहां पाकिस्तान समर्थित आतंकी सक्रिय हैं। कश्मीर घाटी से अधिकांश हिन्दू आबादी का पलायन हो चुका है। तीन लाख से ज्यादा कश्मीरी हिन्दू अपने ही देश में शरणार्थी के तौर पर रह रहे हैं। कश्मीरी पंडित रिफ्यूजी कैंप में बदतर स्थिति में रहने को मजबूर हैं।

यह चिंता की बात है कि दक्षिण एशिया में रह रहे हिंदुओं पर अत्यासचार के मामले लगातार बढ रहे हैं लेकिन चंद मानवाधिकार संगठनों की बात बात छोड दें तो वहां रह रहें हिंदुओं के हितों की रक्षा के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं है। जिस तरह से श्रीलंका में तमिलों के मानवाधिकार हनन के मुद्दे पर अमेरिका,फ्रांस और नार्वे ने संयुक्त राष्ट्रय मानवाधिकार आयोग में प्रस्ताीव रखा और तमिल राजनीतिक दलों के दबाव में ही सही भारत को प्रस्तािव के पक्ष मंन वोट डालना पडा, इस तरह की पहल भारत को भी दक्षेस के मंच पर तो करनी ही करनी चाहिए।

Friday, March 30, 2012

जो तटस्‍थ है समय लिखेगा उनका भी अपराध

दिल्ली समेत दूसरे राज्यों में झारखंड को 'कमीशनखंडÓ के नाम से क्यों जाना जाता है, शुक्रवार को रांची के समीप एक प्रत्याशी के नजदीकी लोगों के पास से करोड़ों की नकदी जब्त होने के प्रकरण ने इसे और पुख्ता कर दिया। इस घटना से उस झारखंड का नाम फिर पूरे देश में दलाली-घूस-रिश्वतखोरी के लिए बदनाम हुआ जहां के 24 में से 22 जिलों में नक्सलियों की समानांतर सत्ता चलती है। आधी से ज्यादा आबादी दो जून की रोटी के लिए मशक्कत करती है। ग्र्रामीण इलाकों में पीने का पानी और बिजली सपने के समान हैं। क्या मिला इन 11 सालों में झारखंड को, शायद बदनामी और जिल्लत के सिवाय कुछ नहीं। राज्यसभा चुनाव को लेकर राज्य मंडी के रूप में मशहूर हुआ। पहले भी कई लोग धन और प्रभाव का प्रयोग कर यहां से चुनकर उच्च सदन में जाते रहे हैं लेकिन इस बार तमाम मर्यादाएं तार-तार हो गई। जिस तरह एक निर्दलीय आए और दो-तीन दिनों में ही अपना सा मुंह लेकर वापस हो गए। बाद में सूटकेस-कार के किस्से, महंगी ऑडी गाड़ी बांटने की अटकलें। कोलकाता में विधायकों की मंडी संजने की खबर झारखंड की दामन में लगा ऐसा दाग है जिसे धोया नहीं जा सकता। देश-दुनिया में हमारी बदनामी हो रही है। भगवान बिरसा की धरती, परमवीर अलबर्ट एक्का की कुर्बानी हमारी विरासत है। झारखंड की धरती रत्नगर्भा है। यहां की खनिज देश-दुनिया में समृद्धि ला रही है लेकिन क्या हम माथे पर बदनामी का दाग लिए घूमते फिरेंगे। राज्यसभा में भी इस पर चिंता जताई गई है। शुक्रवार को उच्च सदन के सदस्यों ने एकमत से झारखंड में थैलीशाहों की राज्यसभा में आने की कवायद का विरोध किया। शर्म की बात है, बड़ा भाई बिहार करवटें ले रहा है और उसी की कोख से जन्मा झारखंड बदनामी की नई ईबारतें दिन-ब-दिन गढ़ता जा रहा है। इस कालिख को पोछकर फेंकना समय की जरूरत है। थैलीशाह उच्च सदन में जाकर क्या करेंगे, झारखंड को कैसा मैसेज देंगे यह समझा जा सकता है। पैसे की लय-ताल पर नाचती झारखंड की राजनीति कहां जाकर रूकेगी, यह मनन का विषय है। क्या हम ऐसे ही जिल्लत की नजरों से देखे जाते रहेंगे? सवाल आपके सामने है। इसका उत्तर भी आपको ही देना होगा। 11 साल में हमारे खाते में बदनामियों के सिवाय कुछ दर्ज नहीं हुआ। क्या इसी के बल पर हमारी राजनीति आगे बढ़ेगी? एक विधायक ने वोट बहिष्कार की घोषणा भारी मन से की। वे नहीं चाहते थे कि पैसा पाने की अंधी दौड़ में अपना जमीर बेच दें। अब फैसला आपकी अदालत में है। सच्चाई भी सामने है। आपके हाथ में भी जब मौका आएगा तो जिन्हें जिताकर भेजा है उनसे यह पूछना मत भूलिएगा कि क्या यही दिन देखने के लिए उन्हें राज्य की सबसे बड़ी पंचायत में भेजा था। याद रखिए फैसला आपको करना है कि क्या इसी लीक पर झारखंड की राजनीति चलेगी। जिन्होंने नोट लेकर अपने वोट बेचे उन्हें पहचानिए नहीं तो समय आपको भी माफ नहीं करेगा। अगली बार चुनाव में ऐसी पटखनी दीजिए कि आने वाले दिनों में नोट लेकर अपना जमीर बेचने के पहले कोई सौ बार सोचे। आपको अपनी भूमिका तय करनी होगी। इस बात की गंभीरता को राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर जी की इस कविता से समझा जा सकता है, समर शेष है नहीं पाप का भागी केवल व्याध्र, जो तटस्थ है समय लिखेगा उसका भी अपराध...।

Tuesday, October 11, 2011

एक साल की सरकार ही बडी उपलब्धि

झारखंड में अर्जुन मुंडा की गठबंधन सरकार ने एक साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है। इस दौरान सरकार के कामकाज को लेकर दावे और प्रति दावे के दौर जारी हैं। सत्ता पक्ष जहां अपने कार्यकाल की उपलब्धियां गिना रहा है वही विपक्ष और सत्ता में भागीदार दलों के कुछ नेताओं की नजर में सरकार कई मोर्चो पर फेल है और सही दिशा में काम नहीं कर रही है। इसके बावजूद जिस तरह से इस सरकार ने एक साल का समय पूरा किया है उससे एक बात साफ हो गई है कि तमाम विसंगतियों के बावजूद अर्जुन मुंडा अलग-अलग विचारधारा और राजनीतिक उद्देश्यों को अधिमान देने वाले दलों को साधकर चलने में काफी हद तक सफल हुए है।
यह विडंबना ही है कि अपने स्थापना काल से ही यह राज्य राजनीतिक अस्थिरता का शिकार रहा है। 11 साल के इतिहास में कई सरकारें बनी लेकिन कार्यकाल पूरा करना तो दूर की बात है वे साल डेढ़ साल भी नहीं चल पाई। शिबू सोरेन खुद इसी गठबंधन की सरकार पांच माह भी नहीं चला पाए थे। यह ठीक है कि किसी भी सरकार की उपलब्धियों का आकलन उसके द्वारा किए कार्यों के आधार पर किया जाता है लेकिन झारखंड के परिपेक्ष्य में यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि सरकार आगे कितने दिन चलेगी। क्या इतिहास अपने आपको दोहराएगा? या कोई नई राजनीतिक गाथा लिखी जाएगी। इस समय जिस तरह से सरकार को सत्ता प्रतिष्ठान के अंदर से ही चुनौतियां मिल रही हैं उससे ऐसा प्रतीत होता है कि राज्य में भाजपा नीति गठबंधन सरकार की आगे की राह आसान नहीं है। सरकार में भागीदारी दल महज सरकार में हिस्सेदारी से संतुष्ट नहीं है वे सत्ता की सवारी करना चाहते हैं। जब सरकार चलाने के लिए गठित राज्य समन्वय समिति के प्रमुख शिबू सोरेन ही बार-बार सरकार के कामकाज पर अंगुली उठा रहे हैं और अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए सरकार के लिए मुश्किल पैदा कर रहे हैं तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि वह सरकार नहीं अर्जुन मुंडा के कामकाज को निशाना बना रहे हैं क्योंकि सरकार में तो उनकी भी पार्टी भागीदार है। सरकार को खतरा उसके सहयोगी दलों से ही है। यह सरकार चलेगी तो आपसी सामंजस्य से और गिरेगी भी तो आपसी अंतरद्वंद्व से। फिलहाल सामंजस्य तो बैठ नहीं रहा है, अंतरद्वंद्व ही ज्यादा दिख रहा है। गुरु जी के बाद अब झामुमो के मुख्य सचेतक नलिन सोरेन ने भी एक तरह से अल्टीमेटम दे दिया है कि छह माह में विकास की गति तेज नहीं हुई तो सरकार बदल दी जाएगी। इससे एक बात स्पष्ट है कि घटक दल भी इस गठबंधन को ज्यादा दिन नहीं चलाना चाहते लेकिन वे सरकार को गिराने का ठीकरा अपने सिर नहीं बांधना चाहते इसीलिए ऐसे पैतरे आजमाए जा रहे हैं। विपक्ष भी सरकार बनाने का मंसूबा पाले हुए है लेकिन वह पहल तभी करेगा जब सरकार अपनी विसंगतियों की वजह से गिर जाए, क्योंकि यदि सरकार गिराने का प्रयास बाहर से किया जाएगा तो उसका सीधा फायदा भाजपा को ही मिलेगा और यही बात अर्जुन मुंडा की सरकार की मजबूती के पक्ष में जाती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगले छह माह अर्जुन मुंडा सरकार के लिए चुनौतियों से भरे होंगे और वह इससे निपटने के लिए कितने संतुलित कदम उठाते हैं यह देखने वाली बात होगी।

रहा सवाल सरकार के साल भर के कामकाज के आंकलन का तो ऐसा भी नहीं है कि उसके खाते में कोई उपलब्धि दर्ज नहीं हुई है। 32 वर्षों से राज्य में लटके हुए पंचायत चुनाव करवा कर मील का पत्थर गाड़ा है। यह अलग बात है कि अभी इस दिशा में बहुत कुछ किया जाना बाकी है। राइट टू सर्विस एक्ट, राज्य में बोली जाने वाली 11 भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा देना और भ्रष्टाचार पर कड़े प्रहार की नीति के दूरगामी नतीजे सामने आएंगे। इसके अलावा भी सरकार के पास अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए बहुत कुछ है। अर्जुन मुंडा अपने एक साल के कार्यकाल की उपलब्धियों से खुश हो सकते हैं लेकिन उनके समक्ष अपने सहयोगी दलों को साधने और राज्य को विकास की पटरी लाने की बड़ी चुनौती है।

राज्य सरकार सहकारिता आधारित विकास की अवधारणा पर काम कर रही है। यह ठीक भी है क्योंकि राज्य की माली हालत ऐसी नहीं है कि वह अपने बूते इस काम को कर सके लेकिन उसे इस बात का ध्यान रखना होगा कि सहकारिता के आधार पर जो योजनाएं बने उसका लाभ प्रत्यक्ष रूप से राज्य को मिले। यह इसलिए भी आवश्यक है कि पूर्व के अनुभव सुखद नहीं रहे हैं। योजना आयोग की रिपोर्ट के आंकड़ों पर नजर डाले तो पता चलता है कि झारखंड के 24 में 14 जिले अति गरीब इलाकों में शुमार है। आजादी के छह दशक और अलग राज्य गठन के 11 वर्षों बाद भी यह बात सोचने को मजबूर करती है कि झारखंड को अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए अभी और कितना वक्त चाहिए जबकि इसी के साथ बने राज्य छत्तीसगढ़ व उत्तराखंड मीलों आगे निकल गए हैं। हैरानीजनक यह है कि अति गरीब जिलों में सिंहभूम भी है जहां लौह अयस्क से लेकर सोने तक का अकूत भंडार है जिसकी बदौलत कंपनियां करोड़ों कमा रही है। सरकार महज रायल्टी से ही संतोष कर रही है और वहां की जनता अति गरीब है। सरकार को यह समझना होगा कि जब तक जल, जंगल और जमीन को ध्यान में रखकर योजनाएं नहीं बनेंगी तब तक विकास की कोई भी अवधारण बेमानी है। झारखंड में यह आजादी से लेकर जब तक मुद्दा बना हुआ है।

भ्रष्टाचार पर सरकार का रुख कड़ा है लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है कि योजनागत भ्रष्टाचार के कारण ही राज्य के विभिन्न जिलों में चार अरब की योजनाएं लटकी हुई है। इसी तरह भू अधिग्रहण नीति स्पष्ट न होने की वजह से छह सौ अरब की योजनाओं पर ब्रेक लगा हुआ है। सरकार को यह ध्यान में रखना होगा कि यदि वह विकास में बाधक नीतियों व नियमों में परिवर्तन नहीं करती तो लोग अपना पैसा राज्य में क्यों निवेश करेंगे और जब तक राज्य में पैसा नहीं आएगा तब तक विकास की बात तो की जा सकती है लेकिन विकास को धरातल पर नहीं उतारा जा सकता। सही तो यह होगा कि सरकार अपने आगे के कार्यकाल में इस ओर विशेष ध्यान दे तभी सहभागिता के आधार पर उसकी विकास की अवधारणा फलीभूत हो पाएगी

Wednesday, June 22, 2011

दोषपूर्ण व्यवस्था की आत्मघाती अनदेखी

झारखंड में 12वीं कक्षा में मात्र 42 प्रतिशत विद्यार्थियों का ही पास होना इतना चौंकाने वाला नहीं है जितना कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री के दोनों बच्चों का परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाना है। कहने को यह कहा जा सकता है कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में इतनी ईमानदारी है कि चाहे कोई कितना भी सामर्थ्यवान क्यों न हो उसे अतिरिक्त छूट नहीं दी जा रही है किंतु यदि शिक्षा मंत्री के बच्चे पढ़ने में कमजोर थे तो क्या उनके अभिभावक को इससे अवगत करना शिक्षक अथवा स्कूल की जिम्मेदारी नहीं थी। सच्चाई तो यह है कि शिक्षा व्यवस्था इतनी लावारिस हो गई है कि उसकी ओर कोई ध्यान देने वाला ही नहीं है। परीक्षा परिणाम शीघ्र घोषित करने की जल्दबाजी में उत्तर पुस्तिकाओं का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं किया जा रहा है और विद्यार्थियों को औसत नंबर दे कर काम चला लिया जा रहा है, हजारों की संख्या में ऐसे छात्र हैं जो उपस्थित रहे हैं और उन्हें अनुपस्थित घोषित कर दिया गया है और बहुत से ऐसे छात्र भी हैं जिन्हें प्रैक्टिकल में तो ९० नंबर तक मिल गए हैं किंतु सैद्धांतिक परीक्षा में शून्य नंबर दिए गए। यह सारी घटनाएं अव्यवस्था का संकेत नहीं देती हैं तो और क्या है? कुछ ऐसे उदाहरण भी हैं कि विद्यार्थी इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा तो पास कर गया है किंतु १२वीं में फेल हो गया। क्या यह माना जाना चाहिए कि १२वीं के प्रश्नपत्र इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा के प्रश्नपत्र से भी कठिन बनाए गए? कारण अनेक हैं किंतु जह रिजल्ट आए नतीजों पर हो-हल्ला मचा तो ठीकरा फोड़ने के लिए सिर की तलाश होने लगी। ऐकडमिक कौंसिल के कर्ता-धर्ताओं का कहना है कि पेपर बनाना और कापी जांचना शिक्षकों का काम है इसमें उनका कोई दोष नहीं है, शिक्षक अपनी अलग समस्या रोते हैं। उनका कहना है कि प्रदेश में शिक्षकों की बेहद कमी है और इसपर उनसे शैक्षणिक काम से इतर काम भी लिया जा रहा है। कुल मिला कर यदि देखा जाए तो समूची शिक्षा व्यवस्था ही इतनी खराब है कि पढ़ाई-लिखाई नहीं हो रही है। इसका प्रभाव यह हो रहा है कि राज्य में तथाकथित शिक्षित बेरोजगारों की फौज खड़ी हो रही है जो प्रदेश के विकास में किसी प्रकार का योगदान नहीं कर सकती है। सच तो यह है कि झारखंड बोर्ड ने पैर्टन तो सीबीएसर्इ का अपना लिया लेकिन उत्ततरपुस्तिकाओं का मुल्यांझकन सही तरीके से नहीं किया गया। ऐसे में जो बच्चे पढ़ने में रुचि लेते हैं उनका मनोबल और उत्साह भी ऐसे नतीजों से ठंडा पड़ जाता है। इम्तहान में फेल होने के कारण अकेले रांची में दो छात्राओं ने आत्महत्या कर ली। इस दुखदायी घटना के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या सरकार अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही से बच सकती है? सच्चाई यह है कि राज्य में पठन-पाठन का माहौल ही नहीं रह गया है। ग्यारह वर्ष पूर्व राज्य के गठन के समय यह कल्पना की गई थी कि बिहार के साथ जुड़े रहने के कारण इसे जो घाटा उठाना पड़ा है उसकी भरपाई अब यहां के लोग, राजनेता और अफसरशाही अपने श्रम से कर लेंगे। कुछ दिनों तक वह जज्बा दिखा भी किंतु बाद में स्थितियां निरंतर बिगड़ती गईं और अब हालात यह है कि जिन राजनेताओं पर नीतियां बनाने की जिम्मेदारी है वे अपनी गद्दी सुरक्षित करने की फिराक में हैं, जिस अफसरशाही पर नीतियों को लागू करने और उसकी निगरानी करने की जिम्मेदारी है वह नेताओं की परिक्रमा करने तथा अपना उल्लू सीधा करने में व्यस्त हैं और बीच में पिस रही है जनता। जहां तक शिक्षक वर्ग का सवाल है तो उसे अधिकाधिक सुविधाओं की मांग से ही फुर्सत नहीं है, वह पढ़ाएगा क्या। परीक्षा परिणाम खराब होने के पीछे भी यही वजह बताई जाती है कि मंत्री और सचिव के बीच तनातनी चल रही है। निचले स्तर के अधिकारी इसमें अपनी गोटियां बैठाने में व्यस्त हैं और शिक्षक अपनी मांगों को मनवाने में। शिक्षकों का सारा जोर इसी बात पर होता है कि कैसे अपने घर के आस-पास तैनाती मिल जाए।
इन सब का कुप्रभाव पठन-पाठन से लेकर ढांचागत प्रबंधों तक पर पड़ रहा है। राज्य के माध्यमिक विद्यालयों में कम से कम दो हजार शिक्षकों की कमी है। शिक्षा नीति के अनुसार हर पांच किलोमीटर पर एक माध्यमिक विद्यालय होना चाहिए। इस हिसाब से पांच हजार विद्यालयों की कमी है। दिनों दिन शिक्षा का प्रसार बढ़ रहा है इसलिए विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसे में यदि उन्हें उचित शिक्षा नहीं मिल पाती है तो यह संख्या प्रदेश पर बोझ ही मानी जाएगी। शिक्षा से वंचित प्रतिभा यदि किसी नकारात्मक काम में जुट जाती है तो वह विध्वंसक ही होगी। झारखंड में शिक्षा का समुचित प्रसार अन्य प्रदेशों की तुलना में अधिक आवश्यक है। अपेक्षाकृत नया प्रदेश होने के नाते इसे अपना विकास तो करना ही है साथ ही यह नक्सलवाद जैसी समस्या से भी जूझ रहा है। शिक्षा का अभाव ऐसी समस्याओं को बढ़ाने वाला ही होगा और इसका लाभ अराजक तत्वों को मिलेगा।

हालांकि पहले संघ लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा में झारखंड के दर्जन भर अभ्यर्थियों की उल्लेखनीय उपलब्धि और लगे हाथ आइसीएसई की परीक्षाओं में करीब नब्बे फीसदी विद्यार्थियों की सफलता ने साबित कर दिया है कि राज्य में प्रतिभा की कमी नहीं। लेकिन कोई न कोई कमी तो है जो प्रदेश में दसवीं और बारहवीं की परीक्षा में परिणाम इतने निराशाजनक आ रहे हैं।

सरकार दावों की वीर है। शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन का दम भरते हुए उसने सीबीएसई पैटर्न लागू कर दिया। अब उसका मुकाबला केंद्रीय बोर्ड से है, किंतु राज्य बोर्ड के नतीजे बताते हैं कि खोट पैटर्न में नहीं बल्कि उसे अमलीजामा पहनाने में। व्यावहारिक रूप से प्रदेश सरकार के शिक्षक उस प्रकार विद्यार्थियों को नहीं पढ़ा रहे हैं जैसे केंद्रीय स्कूलों में पढ़ाया जाता है। इतना ही नहीं निजी स्कूलों में भी सरकारी स्कूलों से बेहतर पढ़ाई हो रही है। नतीजे यह भी बताते हैं कि सावल पाठ्यक्रम की गुणवत्ता का नहीं है, बल्कि शिक्षण की गुणवत्ता का है। पैटर्न बदलने से भला क्या हो सकता, जब तक कि उसे पढ़ाया न जाए। आखिर क्या वजह है कि एक ही कोर्स किसी अन्य स्कूल में पढ़ाया जाता तो नतीजे कुछ निकलते हैं और दूसरे स्कूल में उसके नतीजे कुछ और? यह सरकार के लिए खोज का विषय है। जिस विभाग पर शिक्षित-दीक्षित कर राज्य की वर्तमान और भावी पीढ़ी का भविष्य संवारने की जवाबदेही है, उसकी यह शिथिलता उसके नीति निर्माताओं और कार्यशैली पर सवालिया निशान लगाती है। सरकार इस समय शिक्षा के सवाल पर कठघरे में खड़ी है और उसे उन सवालों का जवाब तलाशना होगा। उसे उन गलतियों को सुधारना होगा जो राज्य के नेता और नौकरशाह कर रहे हैं। जब तक इन कारणों को दूर नहीं किया जाएगा, शिक्ष के क्षेत्र में किली जादू या चमत्कार की आशा नहीं की जा सकती है।





Thursday, June 16, 2011

उपेक्षा से जन्मी समस्या


 अंतत:  झारखंड सरकार जागी है और अब मानव तस्करी निरोधक नीति तैयार की जा रही है, किंतु इसे अभी इतनी लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा कि क्रियान्वयन के धरातल पर उतरते-उतरते काफी समय लग जाएगा। पहले तो समस्या यह थी कि सरकार मानव तस्करी को गंभीरता से ले ही नहीं रही थी और इसी का परिणाम रहा है कि प्रदेश के अनेक लोगों को दूसरे प्रदेशों में जलालत और कष्ट झेलना पड़ा।

झारखंड मानव तस्करों का स्वर्ग माना जाता है। मानव तस्कर प्रदेश में रोजगार की कमी और यहां के नागरिकों के सीधेपन का लाभ उठाकर प्रदेश की श्रमशक्ति को बाहर ले जा रहे हैं और मामूली कीमत या कभी-कभी बिना कीमत के उन्हें गुलाम के रूप में इस्तेमाल करते हैं। तस्कर यहां की लड़कियों से वेश्यावृत्ति कराने से भी नहीं चूकते हैं। मुरहू प्रखंड के एक गांव की लड़की को वेश्यावृत्ति में धकेलने की कोशिश की गई जिसने लौटकर आप बीती सुनाई। वह अकेली नहीं है, ऐसी अनेक लड़कियां हैं जिन्हें प्लेसमेंट की लालच देकर ले जाया जाता है और पहले उनका शारीरिक शोषण किया जाता है बाद में जब शरीर बिकाऊ नहीं रह जाता है तो उन्हें घरेलू नौकरानी के रूप में रूप में इस्तेमाल किया जाता है। जब कोई लड़की बगावत करने में सफल हो जाती है और तस्करों के चंगुल से बच निकलती है तो मामला प्रकाश में आता है और जो बगावत का साहस नहीं जुटा पाती हैं या लोकलाज वश अपनी पीड़ा अभिव्यक्त नहीं कर पाती हैं वे आजीवन उसी नर्क में पिसती रहती है तथा उनका जीवन पशुओं से भी बदतर हो जाता है। एक आंकड़े के मुताबिक प्रदेश से हर वर्ष 33 हजार महिलाएं काम की तलाश में दलालों या तस्करों के माध्यम से प्रदेश से बाहर जाती हैं और उनमें से बड़ी संख्या ऐसी महिलाओं की होती है जो शारीरिक शोषण का शिकार होती है।

बात केवल महिलाओं तक ही सीमित नहीं है बल्कि बड़ी संख्या में पुरुष भी तस्करों के शिकार बनते हैं। उन्हें अच्छे रोजगार तथा मोटी कमाई का लालच दिया जाता है। उन्हें शहरों की चमक-दमक दिखाई जाती और बताया जाता है कि बड़े शहरों में जल्द धनवान बनना आसान है। ऐसा अधिकांश किशोरों के साथ ही किया जाता है। सिनेमा के जरिये बड़े शहरों की खिड़की में झांक चुके किशोर बड़ी आसानी से इस प्रलोभन में आ जाते हैं। तस्कर उन्हें दूसरे प्रदेश में ले जाकर फैक्ट्रियों, ईंट भट्ठों या खेतों में श्रमिक स्पलाई करने वाले ठेकेदारों के हाथ बेच देते हैं। यह खरीद-फरोख्त इतनी गोपनीय होती है कि बिकने वाले को भनक तक नहीं लगती है और जब तक यह प्रक्रिया चलती रहती है तब तक उसकी सम्मान्य अतिथि की भांति सेवा की जाती है। जैसी ही वह फैक्ट्री, ईंट भट्ठे या खेतों में काम के लिए ले जाया जाता है उसे बंधक बना लिया जाता है। ऐसे हजारों बंधुआ मजदूर हैं जिनसे अन्य प्रदेशों में जानवरों की भांति काम लिया जाता है और बदले में जलालत, गालियां और मारपीट मिलती है। जब वह अपनी मजदूरी मांगता है तब उसे बताया जाता है कि मजदूर नहीं वह तो खरीदा गया गुलाम है।

कुछ ऐसे भी मामले सामने आए हैं जिसमें प्रदेश के बाहर अत्याचार का शिकार हुआ व्यक्ति स्वयं ही प्रदेश छोड़ कर कमाई करने के लिए बाहर गया और पुलिस की पेंडिंग फाइलों में चस्पा कर अपराध निपटारे का निवाला बन गया। पुलिस वाले लंबित पड़े मामले की जांच पूरी कर उनकी गिरफ्तारी किसी ऐसे अपराध में दर्ज कर देते हैं जिसके बारे में उसे कुछ भी नहीं पता होता है। जिन राज्यों में नक्सलवाद का प्रभाव है या नक्सलवाद पैर पसार रहा है वहां झरखंड के ऐसे भोले-भाले व्यक्ति को नक्सली बता देना आसान होता है और वाह-वाही पुलिस के खाते में चले जाती है। कुल मिला कर समस्या गंभीर है किंतु उसकी ओर ध्यान देने का कष्ट सरकार नहीं उठाती है।

सरकार को इस ओर ध्यान देने में कष्ट तो होगा ही, क्योंकि यह एक खर्चीला काम है। इस समस्या को दूर करने के लिए उन कारण को समाप्त करना पड़ेगा जो इस समस्या को जन्म दे रहे हैं। यह स्थितियां प्रदेश में रोजगार के अभाव और गरीबी के कारण ही जन्म लेती है। सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा का समुचित प्रसार भी नहीं हुआ है। गरीबी से तंग व्यक्ति की मजबूरी होती है कि वह पेट की आग बुझाने के रास्ते तलाशे और ऐसे में भटकना भी स्वाभाविक है। आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा का प्रसार किया जाए और लोगों को रोजगार के अवसर मुहैया करवाए जाएं। प्रदेश में विकास का समान वितरण हो और विकासशील शहरों में जैसे कल-कारखाने खुल रहे हैं वैसे ही आदिवासी क्षेत्रों में खोले जाएं। लोगों को उनके हित-अहित की सही जानकारी दी जाए और सरकारी योजनाओं को पिछड़े इलाकों की ओर मोड़ा जाए। मानव तस्करी को रोकने के लिए कड़े कानूनी प्रवाधान किए जाएं। हम इस मामले में कितनी देर से चेते हैं इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जापान ने जहां उन्नीसवीं शताब्दी में ही अपने यहां मानव तस्करी निरोधक कानून बना लिया था वहीं भारत में ऐसा कानून महज दो वर्ष पूर्व अस्तित्व में आया है। जाहिर है कि इसे सभी राज्यों में कोने-कोने तक पहुंचने में समय तो लगेगा ही। अब यह राज्य सरकार पर निर्भर है कि वह इसे लागू करने में कितनी तत्परता दिखाती है और किस स्वरूप में इसे लागू करती है। झारखंड में मानव तस्करी निरोधक नीति बनाने की प्रक्रिया भी अभी प्रारंभिक स्तर तक ही सीमित है। समाज कल्याण, महिला एवं बाल विकास विभाग ने इसके लिए नीति का मसौदा तैयार कर लिया किंतु उसे अभी कई अन्य विभागों की स्वीकृति मिलनी बाकी है। यह काम बहुत आसान भी नहीं है। इसके लिए सरकार के सभी विभागों को एक साथ जुटना होगा। इस समस्या को राजनीति और वोट बैंक का चश्मा उतार कर देखे जाने की जरूरत है। यह प्रदेश का सौभाग्य है कि इसके पास इतनी बड़ी श्रम शक्ति उपलब्ध है और इसका यदि सही इस्तेमाल किया गया तो झारखंड को एक विकसित राज्य बनने से कोई ताकत नहीं रोक सकती है।

Wednesday, July 7, 2010

भूतवा खुले के चाही-2


गांव के बडे बुर्जुगों की सलाह पर जो दिन निश्चित किया गया उस दिन बम्बईया पंडित जी पूरे परिवार के साथ बरमबाबा के मंदिर में कसम खाने के लिए पहुंच ही गए। बरम बाबा का मंदिर पंडितों के गांव के बाहर एक खुले मैदान में बना हुआ है। मैदान के बायीं ओर यादव रहते हैं और उसी से सटी दलितों की बस्ती है जो रेलवे लाईन के किनारे तक फैली हुई है। कसम खाने वाले दिन पूरा मैदान ठसाठस भरा हुआ था। सभी के मन में उत्सुकता थी कि होगा क्या ? उधर बिहारी जब घर से चले तो उन्हें पूरा विश्‍वास था कि आज उनका पैसा उन्हें मिल जाएगा क्योकि कोई बरम बाबा की झूठी कसम थोडे ही खाएगा। मंदिर के पास पहुंच कर वे अपने बिरादरी के लोगों के साथ जमीन पर बैठ गए।बिहारी के पहुंचने के साथ ही वहां मौजूद लोगों में खुसरफुसुर होने लगी। दलित बिरादरी के ज्यादा लोगों का मानना था कि पंडित ने अवश्य बिहारी के पैसे हडपे होंगे जबकि पिछडे और सवर्णों की मान्यता यह थी कि धरम करम में यकीन रखने वाले पंडित जी ऐसा नहीं कर सकते ‍उनके उपर मिथ्या दोषारोपण किया जा रहा है। जितने मुहं उतनी बातें। आखिर जब पंडित जी ने हाथ में गंगा जल लिया और सबके सामने यह कसम खाई कि बिहारी ने कभी भी कोई पैसा उन्हें रखने के लिये नहीं दिया था, यदि उनकी बात झूठी हो तो बरम बाबा उन्हें दंड दें। बरम बाबा के प्रति जनआस्था और पंडित जी के कसम खाने के बाद गांव समाज के लिए यह मामला खत्म हो गया। सबको यकीन हो गया कि बिहारी ने दोषारोपण किसी के बहकावे में आकर लगाया होगा। महज कसम खाने भर से पंडित जी लोगों की नजर में सच्चे और बिहारी झूठे साबित हो गए। ग्रामीण समाज की यह विडम्बना है कि बिना सच जाने लोग लोक आस्था के आगे सिर नवाते है और उनकी इसी प्रवृत्ति के कारण अक्सर सच हार जाता है। आज भी ग्रामीण इलाकों में इस तरह के नजारे देखने को मिल जाएंगे। रही बात बिहारी व पंडित जी की तो वे अपना-अपना सच जानते थे। पंडित जी धरम करम को मानने वाले थे उन्होंने पाप व पूण्य का हिसाब लगाकर कसम खाई थी। पता नहीं उन्हें बरम बाबा के प्रकोप का डर था कि नहीं लेकिन बिहारी को पक्का यकीन था कि आज नहीं तो कल बरम बाबा पंडित जी पर भूत छोडेंगे क्योंकि उन्होंने उनकी झूठी कसम खाई थी।


समय बीतने के साथ गांव वालों के साथ पंडित जी भी इस वाकये को भूलने लगे लेकिन बिहारी जब भी बरम बाबा के मंदिर के आसपास से गुजरते उनकी नजरें मंदिर की ओर उठ जातीं, मानों गजारिश कर रही हों कि काफी समय बीत गया आखिर पंडित जी को झूठी कसम खाने का दंड कब देंगे। धीरे-धीरे जब कई साल बीत गए तो बिहारी के सब्र का पैमाना छलकने लगा और यह सोच कर परेशान रहने लगे कि आखिर बरम बाबा भूत छोडने में इतनी देर क्यों कर रहे हैं जबकि उनकी दलित बस्तील के एक व्यक्ति ने जब झूठी कसम खाई थी तो एक माह में ही उन्होंने उसकी बकरी पर भूत छोड दिया था जिससे उसकी मौत हो गई थी।